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शहीद दिवस पर, शहीदों को नमन करते हुए

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  ★ एक छ्न्द ★ शीश जब समिधाओं की हुई है अनिवार्यता तो - वेदिका - श्रृंगार को न घटते रहे हैं शीश । बाल - वृद्ध - बालिकाओं और आर्य - ललनाओं , सभी के समय पर डटते रहे हैं शीश । शीश झुकने दिया न देश - ध्वज - गौरव का , प्रण की प्रतिष्ठा पर कटते रहे हैं शीश । शीश रहे चाहे जाए , जाए नहीं स्वाभिमान , कटते हुए भी यही रटते रहे हैं शीश । ★ कमल किशोर भावुक ★ ~ # कमल किशोर भावुक का - - - - रचना - संसार - - से # ~ लखनऊ 7007298155

पंछी मेरी बात सुनो . . . (भावुक-गीत)

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#भावुक_वीडियो  - - ★ दस ★ ~ ~ ~ ★ पंछी ! मेरी बात सुनो ★~ ~ ~ - - मित्रों ! मेरे एक बहुचर्चित गीत - - दूर देश को जाने वाले , मीठे सुर में गाने वाले मौसम के हालात सुनो , पंछी ! मेरी बात सुनो - - पर कुछ समय पूर्व मेरे बेटे ~ जयदीप किशोर तिवारी ( शिवम ) ~ ने ये वीडियो बड़े मन से तैयार किया था ख़ूब वायरल भी हुआ - - - - थोड़े से कुछ ज़्यादा की तलाश में अपना घर , अपना वतन और अपने प्यारों को छोड़कर - - परदेश में दर - दर भटकने वाले लोगों की मनोदशा को ध्यान में रखकर ये गीत रचा गया है आप भी एक बार दृष्टि डालें - - ~ भावुक ~ #कमल_किशोर_भावुक_की_रचनाएँ #कमल_किशोर_भावुक #परदेशी #पंछी #जिम्मेदारी #घर_परिवार

फिर "जुलुस मौसम के. ." दिल की गलियों से गुजरें हैं

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  एक ग़ज़ल कितने ही अनुबन्धन अपने वादों से मुकरे हैं । फिर जुलूस मौसम के - - दिल की गलियों से गुज़रे हैं । जब तुमने कर दिया रिहा था, फिर क्यूं क़ैद किया है, मेरी ग़ज़लों में यादों के पंछी फिर उतरे हैं । अरमानों का गला घोंट देने का क्रम जारी है , इस दुनिया के चाल - चलन भी अभी नहीं सुधरे हैं । जब से नीड़ नुचा है मेरा, आवारा फिरता हूँ , इतने ' पर ' भी क़ुदरत ने ' पर ' बार - बार कुतरे हैं । जिनको लहू पिलाकर ढाला , ग़ज़लों की शक्लों में , सुनते हैं वे घायल नग़मे महफ़िल के मुजरे हैं । ★ कमल किशोर ' भावुक ' ★ लखनऊ #कमल_किशोर_भावुक_की_रचनाएँ #कमल_किशोर_भावुक #ग़ज़लें #नीड़ #यादों_के_पंछी

पिता जी याद आतें है . . .

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पिता जी याद आतें है . . .    ~: गीत :~ #मेरे_भावुक_गीत ◆ दो ◆ ~★~★ पिताजी याद आते हैं - - ★~★~ लुट गया आशीष वाला गाँव भी , छिन गयी वो प्राणदायी छाँव भी , आँख को आँसू पड़े हैं कम । हो गए लो ! बिना छत के हम । काल ऐसी चाल ओछी चल गया देखो । हर तरफ मेरे उदासी मल गया देखो । ठीक से हम तो सम्भलने भी न पाए थे , आपका जाना अचानक खल गया देखो । यों ख़ुशी में घुल गया मातम । हो गए लो ! बिना छत के हम । आपके आँगन - पला दिनमान था मैं तो । आप थे लघुकाय पर बलवान था मैं तो । उम्र काटी आपने बेशक़ अभावों में , आपके रहते मगर धनवान था मैं तो । आज हैं सब ख़्वाहिशें बे - दम । हो गए लो ! बिना छत के हम । दृश्य पावन ...

हम यहाँ बस चन्द ग़ज़लें, शायरी जीते रहे ...

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बस यही परिचय हमारा...

 बस यही परिचय हमारा....... विश्व सारा है सरोवर, भीड़   है  जैसे  की  जल l  पंक जैसी परिस्थितियां, है खिला जिसमे कमल l       गीत कविता ने शरण दी जब कभी दुनिया से हारा l                                            बस यही परिचय हमारा l