पिता जी याद आतें है . . .
पिता जी याद आतें है . . .
~: गीत :~
~★~★ पिताजी याद आते हैं - - ★~★~
लुट गया आशीष वाला गाँव भी ,
छिन गयी वो प्राणदायी छाँव भी ,
आँख को आँसू पड़े हैं कम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
काल ऐसी चाल ओछी चल गया देखो ।
हर तरफ मेरे उदासी मल गया देखो ।
ठीक से हम तो सम्भलने भी न पाए थे ,
आपका जाना अचानक खल गया देखो ।
यों ख़ुशी में घुल गया मातम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
आपके आँगन - पला दिनमान था मैं तो ।
आप थे लघुकाय पर बलवान था मैं तो ।
उम्र काटी आपने बेशक़ अभावों में ,
आपके रहते मगर धनवान था मैं तो ।
आज हैं सब ख़्वाहिशें बे - दम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
दृश्य पावन गोमती के घाट वाला वो ।
और ठेला चटपटी - सी चाट वाला वो ।
कुछ नहीं भाता मुझे अब मुँह चिढ़ाता है ,
हाट में सुन्दर खिलौना काठ वाला वो ।
नुच गया है प्राण का परचम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
बाँस की वो चकरघिन्नी याद आती है ।
टीन टूटी , घुनी धन्नी याद आती है ।
बचपने में वो मिठाई के लिए भावुक,
जो चुराई थी अठन्नी याद आती है ।
याद का आँगन हुआ है नम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
आँख में गुस्सा , हृदय में स्नेह का सावन ।
थी पिता की गोद मेरा राजसिंहासन ।
नाज़ - नख़रे अब हमारे कौन देखेगा ,
आपके जाते हमारा मर गया बचपन ।
बाँसुरी से छिन गयी सरगम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
लौट आओ फिर , पिताजी ! टेरता हूँ मैं ।
बादलों के पार अर्जी भेजता हूँ मैं ।
लोग कहते , जो गए आते नहीं हैं फिर ,
राह फिर भी रोज अपलक देखता हूँ मैं ।
फिर उमंगों का हँसे मौसम ।
हो गए लो ! बिना छत के हम ।
★ कमल किशोर भावुक ★
~ # कमल किशोर भावुक का - -
- - रचना - संसार - - से # ~
लखनऊ
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