फिर "जुलुस मौसम के. ." दिल की गलियों से गुजरें हैं
कितने ही अनुबन्धन अपने वादों से मुकरे हैं ।
फिर जुलूस मौसम के - - दिल की गलियों से गुज़रे हैं ।
जब तुमने कर दिया रिहा था, फिर क्यूं क़ैद किया है,
मेरी ग़ज़लों में यादों के पंछी फिर उतरे हैं ।
अरमानों का गला घोंट देने का क्रम जारी है ,
इस दुनिया के चाल - चलन भी अभी नहीं सुधरे हैं ।
जब से नीड़ नुचा है मेरा, आवारा फिरता हूँ ,
इतने ' पर ' भी क़ुदरत ने ' पर ' बार - बार कुतरे हैं ।
जिनको लहू पिलाकर ढाला , ग़ज़लों की शक्लों में ,
सुनते हैं वे घायल नग़मे महफ़िल के मुजरे हैं ।
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